Tuesday, July 31, 2012

सपनों का बोझ

                                                                                                  सपनों का बोझ   

हर आंख सपना देखती है, कुछ बंद आंखों से तो हज़ारों खुली आंखें भी बेहिसाब सपनों से लबालब हैं। कहने को ये सपने अपने होते हैं। लेकिन अक्सर यथार्थ में लोगों को खुदसे बेगाना कर देते हैं। मोटे तौर पर सपने दो तरह के होते हैं। एक संतुलित और दूसरे असीमित। सच तो यह है कि हर सपने का एक मोल होता है उसके लिए या तो आपको कुछ चुकाना पड़ता है या चुकना ही पड़ता है। इन सतरंगी सपनों को हकीकत में तामील करने के लिए खुदसे वादा करना पड़ता है उन्हें शिद्दत से पालने पोसने के अलावा धैर्य से उसकी मांग के अनुरूप रास्ते तय करने होते हैं। जो कुर्बानी मांगते हैं, हर रोज श्रम की दरकार करते हैं और एक निश्चित या अनिश्चित समयावधि का इंतज़ार करने का दमखम भी मांगते हैं।

आम तौर पर कुछ सुलझे हुए लोग संतुलित सपनों को ही अपने जीवन में जगह देते हैं। उनकी खास बात यह है कि ऐसे लोग सपनों को प्राथमिकता क्रम में ही सोचते हैं और उन्हें अमलीजामा पहनाने के लिए जतन करते हैं। आप कहेंगे सपने तो भावनात्मक होते हैं तो उसमें संतुलन को कैसे तया किया जा सकता है। लेकिन सच यह है कि यह बड़ा आसान है। सबसे पहले तो किसी सपने का विश्लेषण करने के बाद उसकी वरीयता क्रम तय कर लिया जाता है,,, उन सपनों का आंकलन यथार्थ और गुणवत्ता के आधार पर कर लिया जाता है। सिर्फ उत्पादोन्मुखी सपने हो या देह को आराम भर देने वाले सपनों को हमेशा वरीयता क्रम में सबसे नीचे रखा जाता है। इन सपनों को लंबी अवधि की योजना में रख देने से तनाव कम होता है।

लेकिन अक्सर लोग सपनों के मामले में एक भारी भूल कर बैठते हैं। वे संतुलित सपनों के बजाए असीमित सपनों की दौड़ में अपने वर्तमान को विषैला बना देते हैं। यही नहीं उत्पादोन्मुखी ऐसे सपनों को सच करने की होड़ में वर्तमान के सुकून को पूरी तरह तहस नहस कर डालते हैं। जी हां,, सपनों का सुकून हासिल करने के लिए आज के स्वर्ग को गंवाकर,,,कल के सपनों से अपने आज को नर्क में तब्दील कर देते हैं। इससे मन में कुंठाएं पैदा होती है और हर वक्त मन में तनाव की व्यास अपनी चाप का दायरा बढ़ाता जाता है।
आज हमारे देश मंे सपने भी अपना परिधान बदल चुके हैं। एक दौर था जब लोगों के सपने परंपरागत और संयमित होते थे। लेकिन पश्चिमी सोच ने युवाओं के सपनों को महज़ उत्पादों पर आधारित सपनों से रंग डाला है। गाड़ी, बंगला, नौकर-चाकर और ऐश्वर्य का जीवन,,,,,,यही सपना हर आंख में उपजता है। पैसा, पैसा और, और ज्यादा पैसा ही हर किसी का असल लक्ष्य रह गया है। जाहिर है ऐसे सपनो का ज़मीनी सफर जल्दी तय नहीं किया जा सकता। ऐसे में कर्मक्षेत्र और आचार व्यवहार ही नहीं जीवन में भी भ्रष्टाचार पनपना लाजिमी है। और ऐसा करने से आत्मा की शक्ति कमजोर पड़ती है, जीवन में तनाव पैदा होता है और वर्तमान में मिल रहा क्षणिक सुख और सुकून भी घायल हो जाता है, कुंठाएं इनसान को तिल-तिल कर मारना शुरू कर देती है। जिसका नकारात्मक प्रभाव उस इनसान के मनोविज्ञान पर पड़ता है। सपनों की ऐसी महत्वाकांशाएं समाज में लोगों के चरित्र को थोड़ा बिगाड़ कर पेश करती हैं।

मुझे आज भी याद है, हमारे अखबार के एक सम्पादक हुआ करते थे शाहिद मिर्जा, जिनके घर में न पलंग था और न ही ऐश्वर्य का कोई सामान लेकिन अपनी पत्नी के साथ वो तंग बाजार की थडि़यों पर चटपटे और मिर्च मसालेदार खाने का लुत्फ उठाते दिखाई दे जाते थे। अखबार में पैदल जाते और मौका लगे तो पत्नी को रोडवेज की बस में साथ लेकर घूमने निकल जाते। उन्हें देखकर कभी नहीं लगा कि वर्तमान का सुख न उठाया हो।,,,,,,,,अपने परिवार के बारे में कहूं तो जब होश संभाला तो अपने घर में एक जोड़ी पलंग और छोटा सा सरकारी घर देखते हुए पले बढ़े,,,,उस दौर में लोगों का मेल-जोल और आत्मीय व्यवहार बेहद सुकून देने वाला था। तब मेरी आंखों में भी सपने पलते थे, लेकिन उनका कद बहुत छोटा था,,,फिर कद बढ़ाता गया। गौरतलब यह था कि सपनों को पूरा करने के लिए बहुत शिद्दत से परिश्रम किया।

पालो कोलेहो का उद्धरण है- वेन यू वाॅन्ट समथिंग आल द यूनिवर्स कन्स्पायर्स इन हेल्पिंग यू टू अचीव इट। यानि जब आप शिद्दत से कोई ख्वाहिश करते हैं तो पूरी कायनात उसे पूरा करने में आपका साथ देती है। इस कोटेशन में एक ही बात की कमी थी और वो थी ईमानदारी यानि आपके सपने में ईमान होना चाहिए और ईमानदारी से उसके लिए मेहनत और त्याग किया जाना चाहए। सच तो यह कि कोई भी सपना बिना पागलपन या दीवानगी के नहीं हासिल किया जा सकता। जैसे एक पे्रमी किसी प्रेमिका को पाने के लिए लैला-मजनूं जैसी फनाह होने वाली दीवानगी के बाद ही उसमें प्यार की फुहार पैदा कर पाता है।

दरअसल सपने पूरे होना अहम बात नहीं है गौरतलब यह है कि उन सपनों को हकीकत बनाने की होड़ में कहीं आपने अपने वर्तमान को तो जहरीला नहीं बना दिया। कहीं वे सपने आपके भीतर किसी हवस की तरह आपके असल वजूद को तो नहीं बदल रहे। क्योंकि जिस दिन सपना पूरा हो जाता है तो पीछे मुड़कर देखने पर ही पाने और खोने का अहसास होता है। जैसे मुझे हुआ, सपना था यूनिवर्सिटी टापर होने का,,,गोल्ड मैडल हासिल करने का। उसके लिए जान लगा दी,,,जीवन में पहली बार पढ़ाई,,,पढ़ाई और पढ़ाई,,,हासिल भी हुआ। यह संतुलित सपना था क्योंकि करियर को मजबूत करने वाला था, लिहाजा बाइक के सपने को दफ्न कर दिया। लेकिन उस जीत का जश्न आखिर कितने दिन मनाया जा सकता था। एक सपना पूरा हुआ तो दूसरा पूरा करने के लिए जुट गया। 
 समझ आया कि ऐसे सपने को जो आपको दुःख दें या ईष्र्या से भर दें,,,,,या फिर आपकी नैतिकता को रौंद डालें और बार-बार समझौता करने को मजबूर कर दें। ऐसे सपनों के छलावे से खुदको बचाना चाहिए। बहरहाल सार संक्षेप यह कि अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखते हुए उत्पाद की ख्वाहिश में खुदको,,जलाना नहीं चाहिए साथ ही प्राडक्ट को खुदपर हुकूमत भी नहीं करने देनी चाहिए यानि उसकी गुलामी को स्वीकार नहीं करना चाहिए। ज्यादा लगाव अपने अपनों से और रिश्तों को सींचने के सपने हमेशा सुकून देते हैं,,,करियर बनाने के सपने आपको तोहफे में नया आसमान थमाते हैं।
इसीलिए सपनों का तार्किक विश्लेषण कर लीजिए कि कहीं आपके वर्तमान को विषैला तो नहीं बना रहे,,,कहीं वे आपके आज को कल के इंतज़ार में जला तो नहीं रहे। यही सवाल खुदसे पूछकर तय कीजिए कौनसा सपना आपको बुलंदियों पर ले जाएगा और आपके इर्द-गिर्द सच्चा स्वर्ग कायम कर सकता है।

-स.ब.

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